मरहम, चोट और एक आदतक्या समझूँ और क्या मानूँ अपने प्यार को,इक उम्र का वादा दिया था अपने यार को।कसमों के घेरे में थामे रखा था जो हाथ,छोड़ दिया बीच राह में उसने मेरा साथ।क्यों रकीब मान बैठा मैं उस सादे से इंसान को ?क्यों सौंप दिया अपना सुकूँ उस शख्श अंजान को?वो जो रकीब था, वही मेरे जख्मों का मरहम भी था,पर अफ़सोस, वही मरहम मेरी चोट का सबब भी था।तोड़ दिए उसने वफ़ा के वो ऊँचे मीनार सारे,भर गया वो सीने में ता-उम्र का दर्द हमारे।एक वादा था कि बिछड़े जो एक-दूजे से तो मर जायेंगे,एक वादा ये भी था साथ उम्र भर का हम दोनों यूँही निभायेंगे।मगर जी तो रहे हैं हम दोनों एक-दूजे से यूँ कटकर,और एक दर्द ये भी है कि उसने देखा भी नहीं पीछे मुड़कर।सुना था कि इश्क सच्चा हो तो भुलाया नहीं जाता,क्या तड़पती है रूह तेरी, या मैं कभी तुझे याद भी नहीं आता?अगर तुझे याद नहीं आता, तो मैं हकीकत यही मान लूँ क्या?कि मोहब्बत नहीं थी वो, बस उसे एक 'आदत' हीं समझ लूँ क्या?सुना है कि, आदत कैसी भी हो समय के साथ बदल हीं जाती है,तो मैं खुद को तेरी 'आदत' समझ अब सब्र कर ही लूँ क्या?
✍️ सचिन सैनी
नयनों के घाट का... आखिरी किनारा तुम थे,मेरी पतवार के... एकमात्र खेवैया तुम थे।अजीब कशमकश थी कि पार जिससे पाना था,मेरी कश्ती के लिए... वही भंवर तुम थे।मेरी मंजिल का हर रास्ता... तुम तक ही जाता था,मेरी लहरों का... आखिरी साहिल तुम थे।हर दुआ में मांगा था जिसे... वो मन्नत तुम थे,दिल-ओ-जान से चाहा था जिसे... वो मोहब्बत तुम थे।मेरी हर सांस में, मेरी हर बात में सिर्फ तुम थे...पर हकीकत ये है, कि अब 'हो' नहीं, तुम 'थे'।
किरदार और इंतज़ारखाकर ठोकरें ज़माने भर की, लौट आया हूँ अपने किरदार में,मोहब्बत तो बेपनाह थी उससे, मगर फरेब निकला मेरे एतबार में।वादे तो सात जन्मों के थे, पर वो भूल गया हमें पल भर में,जब चोट लगी मेरे दिल पर, मैं बिखर गया उसके एक वार में।जब संभला तो ये जाना, कि महज़ एक वहम था प्यार में,बस वही एक शख्स नहीं मिला मुझे, जिसे पाना था हर हाल में।अब मुकम्मल कायनात भी मिल जाए, तो क्या फर्क पड़ता है,हम तो मुद्दतों पहले टूट गए थे, महज़ उस शख्स के इंतज़ार में।
✍️ सचिन सैनी
आखिरी मुकम्मल मुलाकातचलो एक बार फिर मिलते हैं, किसी अजनबी की तरह ही सही,पर इस बार तुम्हारी नज़रों में, थोड़ी सी मेरी फिक्र तो हो।भीड़ में खड़े होकर भी, तुम सिर्फ मुझे ढूंढो,भले ही वो चंद लम्हे हों, पर उनमें सिर्फ मेरा ज़िक्र तो हो।तुम आओ तो सही, पर अपनी बेरुखी घर छोड़ आना,वो पत्थर सा दिल, वो बेदिली, ज़रा पीछे छोड़ आना।मैं मर भी जाऊँ तो फर्क न पड़े, ये हुनर तो सीख लिया तुमने,पर उस एक मुलाकात में, मुझे फिर से 'मैं' बना जाना।मुझे मेरे हवाले कर दो, ये बोझ अब सहा नहीं जाता,तुम्हारी यादों के साथ होकर भी, तुम्हारे बिना रहा नहीं जाता।वो जो घुटन है सीने में, उसे एक सिसकी में बह जाने दो,बस एक बार, मुझे मुकम्मल तौर पर, खुद से रिहा कर जाने दो।
✍️ सचिन सैनी
एक तू ही तो यारा हमें सच्चा सा लगा था,पक्का तेरा हर वादा, हर इरादा लगा था।न बातों में बनावट, न जज्बात में झूठ लगा था,हम ही नादान थे, जिनका पहली बार दिल लगा था।तेरे बर्ताव से ही तेरा मन भरा-भरा सा लगा था,हकीकत सामने आई तो लगा, जो लगा था सही लगा था।गिला तुझसे नहीं कि तूने मुझे तोड़ कर रख दिया,दुख तो ये hai कि मेरा यकीन ही सबसे कच्चा लगा था।
ख्वाब जो जल गए सारे, ख्वाब ही थे क्या?यकीन तो नहीं होता, वो आप ही थे क्या?चाहिए था जिसे मैं हर क़िमत पर,वो हकीकत थी या बस बात ही थी क्या?जिनके साये में सुकून मिलता था अक्सर,वो धूप के बदले हुए हाथ ही थे क्या?मुझसे बिछड़कर तुम इतने खुश रहने लगे,मेरे हिस्से में आए सिर्फ जज़्बात ही थे क्या?खामोश खड़े हैं अब यादों के मलबे पर,हम जिसे मंज़िल समझे, वो हादसे ही थे क्या?
एक वहम पाला था दिल ने, कि मिलेंगे तुमसे फिर किसी जन्म में,पर तुम्हारा बिछड़ना अब ज़हर बनकर, उतर गया है मेरे ज़हन में।अब समझदारी के उस मोड़ पर, हम खुद कों तन्हा खड़ा पाते हैं,जहाँ से मुड़कर देखा तो जान गए, अब मिलना नहीं होगा किसी जन्म में।
गलत कौन था इस सवाल का जवाब कहाँ मिलता है,ये इश्क़ है राँझे इसका ईलाज भी कहाँ मिलता है,देकर दलीले हीर बाप की पगड़ी की जुदा होती है,मगर सच तो ये है कि इश्क़ में इंसाफ कहाँ मिलता है..
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